दिल्ली-एनसीआर में 32 कॉलसेंटरों पर दिल्ली पुलिस का छापा, 48 गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस ने सॉफ्टवेयर के दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट की शिकायत पर दिल्ली-एनसीआर में 32 कॉल सेंटरों पर छापा मारा है। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह एफ.आई.आर अभी तक दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड नहीं की गई है, जो अपने आप में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।

संवैधानिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली पुलिस ने इस मामले में नियम कायदों का पालन नहीं किया और काफी अनियमितताएं बरती हैं। संविधान में दिए गए नागरिकों के हिसाब से देखा जाए तो दिल्ली पुलिस ने इस मामले में नागरिक अधिकारों का सरासर उल्लंघन किया है। कोई सबूत न होते हुए केवल शक के आधार पर 48 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

गुड़गांव और नोएडा समेत दिल्ली एनसीआर के 32 कॉलसेंटरों पर छापा मारा गया है। इसके साथ ही एफ.आई.आर को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होता है कि ट्रेडमार्क और कॉपीराइट एक्ट के तहत केवल दीवानी मामले आते हैं और इसमें केवल नागरिक बाध्यता या नागरिक जिम्मेदारी तय की जा सकती है। इंडिया पीनल कोड 1860 के तहत एफआईआर में लगाए गए आरोप दीवानी मामलों की सीमा में नहीं आते।
साइबर लॉ एक्सपर्ट और ट्रेडमार्क एंड कॉपीराइट लॉयर असोसिएशन के वकील हिमांशु राज ने एफआईआर को देखने के बाद कहा, “भारतीय दंड संहिता 1860 के तहत इसमें एक भी फौजदारी आरोप नहीं लगाया जा सकता। इस दंड संहिता के तहत आरोप तय करना असवैधानिक है। यह पूरी तरह से नगरिक बाध्यता या नागरिक जिम्मेदारी का मामला है। आधारहीन, अपने उद्देश्य से भटकी हुई जांच-पड़ताल और शक के के आधार पर यह एफआईआर दर्ज की गई है। इस दंड संहिता के तहत दर्ज किए गए मामलों पर सुनवाई करने से सुप्रीम कोर्ट पहले भी इनकार कर चुका है।“

संवैधानिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने बहुत से मामलों की सुनवाई के दौरान बार-बार कहा है कि बिना किसी आधार और शक के बल पर मामला दर्ज कर जांच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। पुलिस की यह कार्रवाई हमें सख्त, निर्दयी और क्रूर आतंकवादी और विध्वंसक गतिविधि निरोधक कानून (टाडा) की याद दिलाती है।हाल ही में देखा गया है कि इस तरह के मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जल्दी हरकत में आता है। यह दिल्ली पुलिस के लिए आपराधिक शिकायतों पर कार्रवाई की समीक्षा का उचित समय है, जिससे दिल्ली पुलिस अपने कुछ निचले दर्जे के कर्मचारियों की ओर से की जा रही अत्याचार पूर्ण कार्रवाई पर लगाम लगा सके और पुलिस की कोई कार्रवाई अदालती अवमानना के दायरे में न आए और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन न करे।